अल्फ़ाज़ बूढ़ी माँ के अब लब पे ठहर गए,
आते नहीं क्यूँ लौटकर , जो हैं शहर गए।
आया शहर से ख़त तो थी रुख़सार पर नमी
क्या ख़ैरियत से हो तुम ? जाने किधर गए।
मेरी परवरिश में कोई कमी रह गयी थी क्या
पूछा न हाल-ए -दिल मेरा जबसे शहर गए।
आँचल की मेरे छाँव में तुम , दिन रात थे महफ़ूज़
मगर इस शौक-ए-आलम से,तेरे जज़्बात मर गए।


