Friday, 6 December 2019

नारी हूँ लाचार नहीं

अहा!
.........प्रसन्न  हुआ  मेरा  मन
सुनकर सुखद सूचना आज।
अन्यायी  को  दंड मिला  है
न्याय ने जीत का पहना ताज।।

गर्व  मुझे  उस  भाई  पर  है
जिसने दुष्कर खेल ये खेला।
है  प्रणाम  पावन  राखी  को
पल पल मुश्किल को है झेला।।

सुन लो दुष्ट, कुकर्मी,वहशी
जाग उठा  नर पौरुष  अब।
आँख उठा कर देख जरा तू
कर दें  राख जलाकर  सब।।

स्वीकार करो ये नमन मेरा
बेटियों  ने  दिया बधाई  है।
अवतार लिया यदु भूषण ने
हर घर की लाज  बचाई है।।

मैं भारत  माँ  की  बेटी  हूँ
अफ़सोस नहीं इक नारी हूँ।
अब हूँ सतर्क हर विपदा से
न समझो.... मैं  बेचारी हूँ।।
       अर्चना द्विवेदी

Sunday, 1 December 2019

अश्रुपूरित श्रद्धांजलि



नहीं जली केवल एक  बेटी,
नारी का सम्मान  जला  है।
जहाँ  नारियाँ  हुई  उपेक्षित,
असमय आई वहाँ  बला है।।

मानवता  हो  गयी है लज्जित,
रहा  नहीं  विश्वास  किसी  पे।
जाल  बिछा  थे  घात  में  बैठे,
क्रूर चलाक जो अति वहशी थे।।

क्या  लुप्त  हो  गई  पौरुषता,
जो देश की अद्भुत  थाती थी।
या रहे नहीं  अब  श्याम  यहाँ ,
जब चीर स्वयं बढ़ जाती  थी।।

चुप बैठो ना हुंकार  भरो......
अस्मिता न लुट पाए नारी की।
ये  सबला  सृष्टि सृजन  कर्ता
पहचान नहीं  लाचारी की...।।

जल  जाए  लंका रावण  की,
फिर  बेटियों का सम्मान बढ़े।
जीवन हो  सुरक्षित घर  बाहर,
एक सभ्य समाज की नींव गढ़ें।।
                    ।।अर्चना द्विवेदी।।
                           अयोध्या

Wednesday, 30 October 2019

तुम बिन फ़ीकी रही दिवाली



तुम बिन फ़ीकी रही दिवाली

लाल बिना घर सूना सूना
माँ न चाहे ख़ुशियाँ  छूना।
धैर्य समंदर  टूट सा  गया
कोना कोना बना सवाली।।

आया नहीं  आँख का  तारा 
पिता को है जो सबसे प्यारा।
व्याकुल बाहें  चुप  हैं  रस्ते
रहा उदास यूँ घर का  माली।।

मुन्ना  मुनिया बहन बेचारी
राह तकें दिन रात तुम्हारी।
द्वारे-द्वारे ख़ुशियाँ  बिखरीं
इस घर पर छाई थी काली।।

दीप जले लाखों इस जग में
किंतु   अंधेरा  मेरे   मग  में।
तुम्हीं उजाला,तुम आकर्षण
तुम  मेरे  सिंदूर  की  लाली।।

आये नहीं मलाल न  मुझको,
देश से सच्चा प्यार है तुमको।
कर दूँगी परित्याग  सुखों का,
गले लगाकर दुःख की डाली।।

सीमा पर से  जब  घर आना
साथ में विजय  संदेशा लाना।
दीप जलाऊँगी  चुन चुन कर
स्वर्ग हो घर चहके खुशहाली।।

मातृभूमि  से न  कुछ बढ़कर
मान मिले इस पर ही लुटकर।
गर्व मुझे हूँ तेरी संगिनी......
तुम्हीं से  भारत  वैभवशाली।।

तुम बिन फ़ीकी रही दिवाली
             ।।अर्चना द्विवेदी।।
फ़ोटो:साभार गूगल

Sunday, 27 October 2019

दीप पर्व दीपावली


दीप पंक्तियों में सज धज कर 
मन  ही  मन  इठलायें.....
कितनी सुखद मनोहर बेला 
सिय  प्रभु  अवध  में  आये।।

तन मन सबके हर्षित पुलकित,
पावन  घड़ी   सुमंगल  आज ।
सजी दुल्हन सी देव अयोध्या ,
पूर्ण  हुआ  शापित  वनवास।।

निरख रहीं ममता प्रिय छवि को
 कौशल  पति  हितकारी  की।
कंचन  कोमल  काया दमकी ,
जनक  सुता  सुकुमारी   की ।।

झर झर अश्रु  बहे  उर्मि  के ,
देख लखन प्रीतम को पास।
उर  अंतस  में  हुई  रोशनी ,
कोटि दीप दृग जलते आज।।

द्वार सजे तोरण हो उत्सुक,
आँगन खिलती रंग रंगोली।
सुख  वैभव  ऐश्वर्य संग  में ,
चढ़कर आती लक्ष्मी डोली।।

आओ मिल जुल दीप जलाएं,
द्वेष कलुष का तम मिट जाए।
सत्य  राम,  सुंदरता   सीता ,
बन प्रतीक कौशल पुर आएं।।

प्रथम दीप वीरों की ख़ातिर,
दूजा  माँ के  चिर  वंदन  में।
सजे दिवाली,खिले दिवाली,
दीप जले फिर  अन्तर्मन में।।
                     ।।अर्चना द्विवेदी।।

Sunday, 20 October 2019

माँ-बेटी


जब याद सताती है माँ की
अपलक आईना तकती हूँ
मैं अपनी  माँ के  जैसी  हूँ
सच अपनी माँ के जैसी हूँ।।

ममतामयी चेहरा,निश्छल आँखें
वात्सल्य  भरा  है  सीने  में
निःस्वार्थ भाव,कोमल  बाहें
आनंद  मिले  फिर  जीने  में।।