हर किसी को अपना बचपन याद आता है। हम सबने अपने बचपन को जिया है। शायद ही कोई होगा, जिसे अपना बचपन याद न हो ।माँ की गोद,पापा का स्नेह,भाई-बहन के साथ हुई शरारतें,सखियों की नेक झोंक सब कुछ बहुत याद आता है।ऐसे ही कुछ भूले बिसरे भावों को समेटे हुए मेरी ये नई कविता ...
फिर से आजा तू प्रिय बचपन,
जीवन की नीरस राहों में।
फिर से जी लूँ वो मीठे पल,
ममता दुलार तेरी बाहों में।।
डगमग जब होने लगें पैर ,
गिरने से पहले थाम ले तू।
आँसू से भरे हों नयन मेरे,
गलती मेरी ,पर मान ले तू।।
मैं बोलूँ तोतली बोली जब ,
सुन सुन कर हर चेहरा चहके ।
दादी नानी के किस्से सुन ,
मेरे जीवन की बगिया महके ।।
दौडूँ भागूँ कर मनमानी,
माँ की मीठी फटकार सुनूँ।
पापा के कंधे पर घूमूँ ,
सपनों का नया संसार चुनूँ।।
बेबात लड़ाई सखियों संग ,
गुड्डे गुड़ियों की शादी में.....।
अब ऐसे सुख को मन तरसे ,
जो मिलता उस आजादी में...।।
चाहे हो जाऊँ पचपन की,
पर साथ तुम्हारा न छूटे ।
हँस लूँ रो लूँ तेरी बाहों में,
बंधन अनमोल ये न टूटे ।।
न हृदय में कोई द्वेष पले,
मैं अपना पराया न जानूँ ।
जिन अधरों पर मुस्कान दिखे ,
उन चेहरों को अपना मानूँ ।।
दिन बीत रहे मौसम बीते...,
अनुभव ने नया आयाम छुआ।
तेरी अनुपम स्मृतियों से...,
नव ऊर्जा का संचार हुआ ।।
सुन बचपन ! तू प्रेरक मेरा ,
हर ग़लती से मैंने सीखा।
छू तेरी सुखद मधुर यादें ,
जीवन सुन्दर बन कर बीता।।
मैं हूँ पतंग.....तू डोर मेरी,
उड़ चलें संग अरमान लिए।
अनुपम संसार बसा लेंगे....,
खुशियों का सब सामान लिए।।
।।अर्चना द्विवेदी ।।
फ़ोटो: साभार गूगल
नवल वर्ष के नवल दिवस पर,
हर्ष का दीप जलाएं मिलकर।
ऋतु ने ओढ़ लिया नव चादर,
प्रकृति का नव सौंदर्य उजागर।।
वसुधा कर ली षोडश श्रृंगार ,
छवि दिव्य अलौकिक है अपार।
स्नेहिल उर अतिशय प्रीत भरे ,
बन परम पुरुष का प्रणय द्वार।।
चहुँ ओर सजी सरसो पीली,
अलि गुंजन मन उल्लास भरें।
सुन मधुर कोकिला की बोली ,
विरहित मन का संताप हरे।।
भर ताप ग्रीष्म का मधुर मिलन ,
किसका यह अनुपम सृष्टि सृजन।
स्वर्णिम किरणों से सजे आम ,
हो व्यक्त रूप अतुलित ललाम।।
खेतों में महकती पकी फसल,
भरती आशा उल्लास नवल।
नव दुर्गा पूजन घर घर में..,
हो शांति भक्ति सबके उर में।।
स्वागत नव वर्ष का हम कर लें ,
आपस की कटुता कम कर लें।
यह संस्कृति है अनमोल धरोहर,
संकल्प नवल मन में भर लें।।
।।अर्चना द्विवेदी।।
फ़ोटो:साभार गूगल
सारी खुशियों दिल में समेटे, सदा हंसाता मेरा घर ,
आंधी तूफानों को सहकर ,हमें बचाता मेरा घर ।।
भाई बहन पिता माता की ,यादों का मीठा संसार
सारे सपने घर में पूरे , मन उड़ जाता पंख पसार
दादी मां की सुना कहानी ,अच्छी नींद सुलाता घर //
कंकड़ पत्थर तन में भर ,मजबूत बहुत बन जाता है
प्रेम ,त्याग ,बलिदान करो ,घर सच्ची राह दिखाता है
थकन मिटाता दिन भर की ,सम्मान बढ़ाता मेरा घर।।
आवासहीन कितने बच्चे ,दर बदर भटकते रहते हैं
गर्मी में लू-धूप , ठंड में ,शीतलहर सहते रहते हैं
एक स्वप्न है आंखों में तैरता , हो पाता एक मेरा घर ।।
तेरा , मेरा , अपना , पराया , स्वार्थ भरी बातें भूलो
वसुधा को समझो कुटुम्ब,सबको अपनाकर मन छू लो
हर जन का अपना घर हो, जब समझें भारत हैं मेरा घर।।
।। अर्चना द्विवेदी।।
फ़ोटो:साभार गूगल
आसमान है रंग-बिरंगा...,
चेहरों पर मुस्कान है छाई।
मन ये गाये गीत मिलन के,
देखो फिर से होली आई ।।
जले होलिका गाँव गाँव में,
सारे दुःख संताप हरे....।
महक उठी मीठी गुझिया से,
मधुर प्रेम उल्लास भरे...।।
रंग लगा हाथों में राधा,
ढूंढ रही फिर कान्हा को।
गालों का ये रंग गुलाबी,
भुला न दे बरसाना को।।
कहीं उड़ रही चूनर धानी,
रंग अबीर गुलाल लिए...।
शर्म लाज आँखों में लेकर,
पिया मिलन की आस लिए।।
भंग के मद में चली टोलियाँ,
बजते ढोल मजीरे आज...।
झूमे सखियाँ मिलकर सारी,
गायें गीत सुमंगल फाग...।।
अबकी होली में रंग बरसे,
प्रेम भरी पिचकारी से.....।
द्वेष का रंग न फैले जग में,
सीखो कृष्ण मुरारी से....।।
।।अर्चना द्विवेदी।।
फ़ोटो: साभार गूगल
नारी की महिमा आज सुनो,
मैं भी एक कोमल नारी हूँ।
तन मन दोनों ही पावन हैं ,
प्रियतम को अतिशय प्यारी हूँ।
जीवन के कुछ पल ऐसे थे,
महसूस हुआ बेमोल हूँ मैं।
कुछ पथिक मिले अनजाने से,
एहसास हुआ अनमोल हूँ मैं।
उषा की पहली किरण हूँ मैं,
दुःख दूर करूँ मुस्कानों से।
हर स्वप्न करूँ पूरे सबके,
विस्तृत नभ के अरमानों से।
माँ, बेटी,बहन,संगिनी हूँ,
हैं रूप कई इस नारी के।
हर रिश्तों में नवजीवन भर,
पुष्पित हो लूँ फुलवारी में।
हूँ अबला पर कमजोर नहीं..,
माँ दुर्गा,लक्ष्मी, काली हूँ..।
एक सफ़ल पुरुष की नींव हूँ मैं,
होठों पे खिली सी लाली हूँ..।।
अन्नपूर्णा हूँ, वीरांगना हूँ...,
मैं वीर पुत्र की जननी हूँ...।
मैं शक्ति हूँ, प्रभु भक्ति हूँ...,
विष्णु की हस्त कुमुदिनी हूँ..।
निश्छल है हृदय सावित्री सा,
सीता सा पतिव्रत करती हूँ।
जीजाबाई की कोख मेरी..,
भामती का तपबल रखती हूँ।।
संकोच,लाज,और शील,स्नेह,
ये सब नारी के अलंकार...।
न समझो रमणी,भोग्या तुम ,
है विष समान इनका प्रहार ।।
बेटी दहेज से हो पीड़ित ,
आज़ादी का अधिकार नहीं।
पैरों में बेड़ियाँ हों जकड़ी ,
ये नारी को स्वीकार नहीं ।।
मेरा एक निवेदन हर नर से,
मत नारी का अपमान करो।
एक रथ के दो पहिये हैं ये..,
इस धुरी का तुम सम्मान करो.।
नारी विहीन गर हुई धरा ,
सृष्टि का अंत सुनिश्चित है ।
हर कण में सूनापन होगा ,
ईश्वर ने किया ये इंगित है।।
नर वृहद वृक्ष,नारी छाया ,
एक दूजे बिना अधूरे हैं..।
नर योग पुरुष,नारी माया,
जब साथ रहें तब पूरे हैं..।।
।।अर्चना द्विवेदी।।
फ़ोटो:साभार गूगल